हार-जित से तो यूँ हीं बदनाम है जिन्दगी
दरअसल, अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी |
जब तक सांस है, तुझमे जद है,
सवार लो जिन्दगी |
न जाने कब शमशान हो जिन्दगी |
हँस लो, मुस्कुरा लो…..
ढूँढ लो हर ख़ुशी |
क्या पता कब खाक हो जिन्दगी |
क्या फ़कीरी, क्या अमीरी
क्या इबादत, क्या तिजारत,
मौत के घर बेजुबाँ है जिन्दगी |
नेक बन नेकी कर |
यहाँ न गैर न अपना कोई |
मत कर कोई अहं,
सोच भला, कर भला, बसुधैव कुटुम्बकम !
इंसान ही रहूँ न आये कभी दरिंदगी,
सुकून से मौत की बस है बंदगी |
कभी जश्न, कभी आह
कितने अक्स तेरी जिन्दगी !
वक़्त की जुबाँ,
वक़्त से ख़ामोश,
क्या अदा जिन्दगी !
हार-जित से तो यूँ हीं बदनाम है जिन्दगी
दरअसल, अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी |
©अविनाश कुमार (ak25avi@gmail.com, 8051997288)
