कतेको बेर, कतेको केँ 

बिसरबाक क्रम मे  

मोन पड़ैत छी बेर-बेर आहाँ 

अहाँक बाद जतेक ठाम सँ 

 ’आहाँ’क संबोधन भेटल 

ओ नहिं छल अहाँ सन। 

कहाँ कियो बुझलक बिनु कहने मोनक गप्प 

नै कहियो हिचकीये भेल परोक्ष-चर्चा सँ, 

ओ टेलीपैथी त’ अहिं संग बिलहि गेलैक। 

केहेन बिर्रो मे ओझरेलहुँ हम 

संग सँ संगी धरि  

भ’ जेल अनभुआर, 

हम असगरे अन्हार मे  

डिबिया बाड़ने रन्ने-बन्ने भूतियाइत रहलहुँ, 

मृगतृष्णा मे ततेक यात्रा तय भ’ चुकल अछि 

जे आब घुरब मुश्किल अछि 

ओनहियो आब के तकैत अछि बाट, 

हमर अबैया के, 

कतेक समीकरण आ संधिक बाद 

पीठ, पीठ के तकैत विदा भेल छल, 

ई ताकब आब टीसैत अछि, 

आ ई टीस क्रमशः जुआन होइत रहैत अछि।