मैं रात भर जन्नत में था

थी तलब जिनसे रूबरू कि,

थी आरजू जिनसे गुप्तगू कि,

वो चाँद कल मेरे आँगन में था |

मैं रात भर जन्नत में था |

मासूम चेहरा, अधरों पर मुस्कान लिए,

झील सी आँखें, सुर्ख होंठ,

घनेरी जुल्फ, यौवन में उफ़ान लिए ,

वो प्रतिरूप अप्सरा कि,

नूर इस धरा की |

वो खनकती आवाज उसकी,

मेरे अंतर्मन को छेड़ती,

कभी इठलाती, कभी इतराती,

मुझे गुदगुदाती रही |

मैं स्वप्नों के आलिंगन में,

उसके मादक हुस्न के बंधन का

रोम-रोम में एहसास किया ,

‘बेपरवाह’ कल रात भर प्यार किया |

सच, उसे पाना एक मन्नत सा था |

मैं कल रात भर ………………….

© अविनाश ‘बेपरवाह’