
ना ग़मों का बादल हटा पाया, ना ही खुशियों की बारिश ला पाया,
पुराने चिथड़े की तरह जिन्दगी दरकती रही,
कश्मकश में मैं, कभी सिलता रहा, कभी ढकता रहा |
फ़क़त फिक्र-ए-ख़ुराक में उलझा ‘बेपरवाह’ वक़्त गुजर जाता है,
याद तुम भी आते हो, याद अपना घर भी आता है,
पर सपनों की चाहत, अपनों की मुहब्बत को बेअसर कर जाती है |
जब हर शाम थक कर घर लौटता हूँ, सोचता हूँ तुझसे आज जी भर के बात करूंगा,
पर ना जाने कब आँख लग जाती है और फिर सूरज नज़र आता है |
जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है,
जिस दिन ठहर जाता है, इन्सान गुजर जाता है |
(c) अविनाश ‘बेपरवाह’