by crlavinash@gmail.com | Nov 30, 2015 | Medium
“इश्क़ में शहादत को तेरी मुस्कुराहट ही काफ़ी थी कातिल… यूँ बेपरवाह गले लगाने की जरुरत क्या है ?” “Ishq me shahadat ko teri muskurahat hi kafi thi katil… Yu beparwah gale lagne ki jarurat kya hai?” “रंजिश-ए-इश्क़ में यूँही बरबाद हुआ बेपरवाह कसूर फ़क़त इतना सा था- फिक्र...