व्यापार

व्यापार

अपने होटल से अभी निकला ही था… गाड़ी मुख्य सड़क को पार कर एक गली से गुजर रही थी। धूप तीखी थी, सड़क जैसे चमक रही थी । एक छोटे बच्चे को सीने से लगाए वो एक प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी थी। उम्र कुछ 32-34 रही होगी, बच्चा शायद 6 महीने का रहा होगा। पीले रंग की साड़ी थी, डीप...
दिल अपनी जगह पर नहीं था

दिल अपनी जगह पर नहीं था

कुछ कहानियाँ शुरू नहीं होतीं… वे धीरे-धीरे खुलती हैं। जैसे किसी इंसान की आँखों में छुपी हुई एक चुप सी थकान, जो पहली नज़र में दिखती नहीं, पर अगर आप थोड़ा ठहर कर देखें… तो बहुत कुछ कह जाती है। राजेश से मेरी मुलाकात भी कुछ ऐसी ही थी। वो एक साधारण सा टैक्सी ड्राइवर...
मैं

मैं

जो कभी, यूँ ही अनाहूतछूट जाए यह आवरण,और लौट जाऊँ मैं घरतुम्हें मलाल होगा,बिछड़ने का नहीं,उस अंतिम क्षण कीजहाँ अहं ने प्रेम पर विजय पाई थी। अश्रु,वे तो प्रकृति का ऋण हैं,बहकर शांत हो जाते हैं;पर जो कंपन उठता है भीतर,वह प्राण का स्पंदन है-दीर्घ, अदृश्य,और काल साक्षी।...

जलेबी

ये उन दिनों की बात है जब पैरों में कोई लेक्सो का हवाई चप्पल होता था, जिसपर कछुआ छाप से थोड़ा जलाकर हम निशान बना देते थे कि कहीं बदला ना जाये, घुटने से दो बिलांग छोटी बुल्लू (ब्लू) कलर की पैन्ट होती थी, जिसमें जिप की जगह बटन होता था क्यूंकि जिप में अक्सर मेरा फंस जाया...

‘अहाँ’ (मैथिली कविता)

कतेको बेर, कतेको केँ  बिसरबाक क्रम मे   मोन पड़ैत छी बेर-बेर आहाँ  अहाँक बाद जतेक ठाम सँ   ’आहाँ’क संबोधन भेटल  ओ नहिं छल अहाँ सन।  कहाँ कियो बुझलक बिनु कहने मोनक गप्प  नै कहियो हिचकीये भेल परोक्ष-चर्चा सँ,  ओ टेलीपैथी त’ अहिं संग बिलहि गेलैक। ...