लप्रेक  (मैथिली)

1)   मोना सिनेमा लग कार पार्क क’ गौरव आ आशीष अंटा घाट तरकारी किनि रहल छेलाह | घूमला त’ गौरव के आल्टो के पाछू एकटा होंडा सिटी लागल छल | ड्राईवर सीट पर एक जुवान छौड़ा एकटा कनैत दूधपीबा बच्चा के कोड़ा में लेने चुप्प करेबा में लागल छल |    ‘ठक-ठक’  गाड़ी के खिड़की के...
मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर

मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर

फिर से वही उलझन, वही उधेड़बुन किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर | मस्तिष्क में हलचल, मन विस्मित ‘लेकिन…किन्तु…परन्तु’ मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर | मूल्यहीन समाज मूक-बधिर अर्थ विचार, अर्थ व्यव्हार, अहम् युद्ध, विकृत संस्कार | मैं अबोध अज्ञान निस्वार्थ...
….memories keep us alive :)

….memories keep us alive :)

“इश्क़ में शहादत को तेरी मुस्कुराहट ही काफ़ी थी कातिल… यूँ बेपरवाह गले लगाने की जरुरत क्या है ?” “Ishq me shahadat ko teri muskurahat hi kafi thi katil… Yu beparwah gale lagne ki jarurat kya hai?”   “रंजिश-ए-इश्क़ में यूँही बरबाद हुआ बेपरवाह कसूर फ़क़त इतना सा था- फिक्र...
बेपरवाह मैं बिंदास हूँ…..

बेपरवाह मैं बिंदास हूँ…..

कोई जख्म था दिल पर, अक्सर तकलीफ रहती थी.. फिर गुस्सा आया….दिल चिर लिया…यादों के धागों से रफ्फू किया….मरहम किया, पट्टी भी की….उस हसीं के कातिल नस्तर को, बाहर निकाल कर फेंक दिया…अब फिर से मेरा दिल जवां, पुराने नकली रकीब की फिक्र नहीं, किसी अतीत का जिक्र नहीं….अब बेपरवाह...