जो कभी, यूँ ही अनाहूत
छूट जाए यह आवरण,
और लौट जाऊँ मैं घर
तुम्हें मलाल होगा,
बिछड़ने का नहीं,
उस अंतिम क्षण की
जहाँ अहं ने प्रेम पर विजय पाई थी।
अश्रु,
वे तो प्रकृति का ऋण हैं,
बहकर शांत हो जाते हैं;
पर जो कंपन उठता है भीतर,
वह प्राण का स्पंदन है-
दीर्घ, अदृश्य,
और काल साक्षी।
महसूस होगा कि –
एक रिक्तता है,
दीवारों में नहीं,
अपितु चेतना में;
घर यथावत रहेगा,
पर ‘घर’ तत्व विलीन हो जाएगा ।
और तेरा जगत होगा –
केवल एक अनवरत प्रवाह ।
क्रोध भी एक यात्रा है –
स्वयं से आरंभ होकर,
स्वयं में भटकता है,
और अंततः स्वयं में ही
लय को प्राप्त हो जाता है।
परन्तु काल ?
वह न तो शत्रु है, न मित्र,
वह केवल साक्षी है;
सब कुछ समेट लेता है,
फिर सब स्थिर कर देता है
और मैं-
स्मृति बनकर रह जाऊंगा,
तुम्हारी वाणी के बीच,
तुम्हारे मौन के भीतर।
शायद घर की दीवार पर भी ।
फिर एक दिन लौटूँगा मैं
एक बोध बनकर
जब तुम्हारा समय निकट आएगा
अपने घर लौटने का।
(C) अविनाश