अपने होटल से अभी निकला ही था… गाड़ी मुख्य सड़क को पार कर एक गली से गुजर रही थी। धूप तीखी थी, सड़क जैसे चमक रही थी ।
एक छोटे बच्चे को सीने से लगाए वो एक प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी थी। उम्र कुछ 32-34 रही होगी, बच्चा शायद 6 महीने का रहा होगा। पीले रंग की साड़ी थी, डीप नेक ब्लाउज था, क्लिवेज दिख रहा था। बच्चा उसकी छाती से इस तरह चिपका था।
वहाँ और भी कई औरतें थीं- कुछ 10-20 बैठी हुईं, 10-20 खड़ी धूप में छाता लिए, मुस्कुराते हुए। वो मुस्कान… पहली नज़र में सामान्य लगती है, पर ये पेशागत आदत से आयी है जैसे किसी सर्विस बिजनेस के रिसेप्शन पर बैठी हुई लड़की या हवाई जहाज का क्रू।
दोपहर के शायद 12 बज रहे थे। दोपहर… जब ज़्यादातर शहर अपने-अपने कामों में उलझा होता है। पर यहाँ… जैसे कोई और ही समय चल रहा था।
मुझे ड्राइवर ने बताया कि “सर, ये यहाँ का रेड लाइट एरिया है।”
मैंने थोड़ा झिझक कर पूछा-
“दिन में भी ऐसा रहता है क्या?”
वो हंसा नहीं, चौंका नहीं… बस सीधा जवाब दिया
“हाँ सर, ये कलकत्ता जैसा है, 24 घंटे सुविधा है और कई वर्षों से है।”
उसके लिए ये बस जानकारी थी। मेरे लिए एक असहज और स्तब्ध विचार।
गाड़ी आगे बढ़ गई, पर मैं कहीं छूट गया था। जैसे मेरा एक हिस्सा वहीं उस गली में, उस कुर्सी के पास बैठ गया हो ।
क्या मजबूरी होगी जो इतने छोटे बच्चे को लेकर ये ऐसा काम कर रही है?
ये सवाल सिर्फ दिमाग में नहीं आया… भीतर कहीं चुभ गया।
जब किसी के साथ जाती होगी तो बच्चे को कहाँ छोड़ती होगी?
क्या कोई कोना होगा… कोई दूसरी औरत… या बस वही कुर्सी? ये किसका बच्चा होगा?
क्या वो आदमी कभी जानता भी होगा कि वो पिता है? क्या बच्चे के साथ इसे कस्टमर मिलते होंगे या कम पैसा मिलता होगा? क्या बच्चा होने से ग्राहक कम हो जाते होंगे… या बढ़ जाते होंगे? क्या वो बच्चे को साथ लेकर ही मोल-भाव करती होगी?
या फिर ये बच्चा भी उसके “काम” का हिस्सा बन चुका होगा—एक खामोश गवाह की तरह?
मैटरनिटी लीव भी नहीं है इसके पास…ये सोचकर ही अजीब लगता है, जहाँ “लीव” जैसा शब्द भी शायद अनजान हो। लीव छोड़ो- कोई राइट, कोई सोशल सिक्योरिटी, कोई फाइनेंशियल सिक्योरिटी, कोई हेल्थ सिक्योरिटी है क्या इसके पास? क्या ये सब शब्द विचार में भी आता होगा ।
तमाम प्रश्न अनवरत परेशान कर रहे थे… और जवाब… जैसे खुद ही बनते और खुद ही टूटते जा रहे थे।
फिर ख्याल आया कि मैं भी तो शरीर ही बेच रहा हूँ… बस तरीका अलग है। अपना दिमाग, अपना वक्त और अपनी ऊर्जा । ये भी तो व्यापार है।
मैं दिमाग की ताकत बेच रहा हूँ, कोई मजदूर अपने शरीर की ताकत बेच रहा है, कोई पुजारी अपने ज्ञान की ताकत बेच रहा है, कोई कलाकार अपने किसी अंग का हुनर बेच रहा है… और ये औरत भी अपना स्तन, अपनी गुप्तांग, अपनी देह बेच रही है…देह पूरा तो नहीं कह सकते…
मुझे यकीन है- कोई कस्टमर उसके माथे को नहीं चूमता होगा, कोई उसके पैर को नहीं चूमता होगा।
कुछ हिस्से हमेशा बिकने से बच जाते हैं… या शायद… कोई उन्हें खरीदना ही नहीं चाहता।
क्या ही अंतर है मुझमें और उस औरत में !
ये सही-गलत का विचार तो सामाजिक दायरों और परवरिश के कारण हमारे अवचेतन में बैठ गया है…पर उसके अवचेतन में क्या होगा?
क्या उसके लिए ये बस काम है? एक रूटीन… जैसे किसी ऑफिस जाने वाले के लिए सुबह की मीटिंग? जैसे किसी जासूस के लिए या किसी फौजी के लिए दुश्मन की हत्या ?
या फिर हर बार जब कोई मर्द उसकी देह पर काम क्रीड़ा में मदमस्त होता होगा,
तो वो भीतर ही भीतर कहीं और चली जाती होगी? क्या वो उसे प्रसन्न करके कुछ टिप पाने के बारे में सोचती होगी…या कभी-कभी… बस चाहती होगी कि ये सब जल्दी खत्म हो जाए?
कल रात होटल स्टाफ को मैंने कुछ सर्विस इश्यू को लेकर बोला था।
उसका जवाब था- “कॉर्पोरेट गेस्ट बहुत कम आते हैं और उनका टैरिफ भी कम है। 70-80% गेस्ट कपल आते हैं, उनका चार्ज डबल होता है। उन्हें चाय-पानी जैसी सर्विस से मतलब नहीं होता।”
तब वो एक साधारण-सी जानकारी थी। आज… वही बात कुछ और लग रही थी।
शायद मैं पहले भी कभी इस शहर में आया था…पर तब मैंने सहर देखा था ।
अब सूरज ढल रहा है, मैं अपने ऑफिस के अप्प्लिकेशन में चेक आउट कर दिया हूँ । चलो शाम होने को है अब होटल लौट चलें थोडा आराम करें ।
वो ओवरटाईम भी करती होगी क्या ? करती ही होगी, उसका बिजनेस है ।