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फिर से वही उलझन, वही उधेड़बुन

किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |

मस्तिष्क में हलचल, मन विस्मित

‘लेकिन…किन्तु…परन्तु’

मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |

मूल्यहीन समाज मूक-बधिर

अर्थ विचार, अर्थ व्यव्हार,

अहम् युद्ध, विकृत संस्कार |

मैं अबोध अज्ञान निस्वार्थ अभिमन्यु,

ये कौरव चक्रव्यूह का सातवाँ द्वार |

‘बेपरवाह’ मन विकल विह्वल

पग-पग दुत्कार, हर क्षण संघर्ष,

ना दृढ़निश्चय ना आत्मविश्वास

परंच, मैं अग्रसर जनक गन्तव्य पर |

कुछ उलझन, कुछ उधेड़बुन

किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |

थाम ऊँगली जनक बाट दिखाओ

सत्य क्या है? सन्मार्ग बताओ…

पुनः मंत्रणा आपके मंतव्य पर

मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |