गंगा समंदर से मिलकर खुश तो नहीं होगी। मुझे पक्का यकीन है कि वह खुश तो नहीं है। मेरा यकीन बेशक मेरे पैमाने से है, पर क्या ‘मेरा पैमाना’ गलत हो सकता है?

समंदर में मिलकर गंगा, गंगा कहाँ रह पाती है! वह मीठी नहीं रहती, कोई एक कतरा भी बोतल में समेटकर घर नहीं ले जाता, कोई वैसे प्रणाम भी नहीं करता, कोई पूजा नहीं करता, कोई नहाकर पुण्य की अनुभूति नहीं करता।

पर गंगा ने समंदर से मिलने का ऐसा फैसला क्यों लिया? क्या वह प्रेम में दीवानी थी? या उसका आत्मविश्वास कम हो गया था जब सबने कहा होगा कि यह मिलन ही मोक्ष है? या उसका आत्मविश्वास अधिक हो गया था जब उसने अपने जैसी दिखने वाली कई पर्वत-संतानों को खुद में मिलकर ‘गंगा’ बनते देखा? क्या उसने सोचा था कि समंदर से मिलकर वह उसे भी गंगा बना देगी? या किसी ने उससे कहा कि तुम स्त्री हो—भारतीय स्त्री, और समंदर पुरुष है; जाओ, मिलकर वहाँ नाम और पहचान सब त्याग दो, अब उसका नाम ले लो? क्या उसके पिता पर्वतराज और देवी मेना ने उसे मिलने से नहीं रोका? आवाज तो जरूर दी होगी, गंगा शायद सुन नहीं पाई; अपनी उच्छृंखलता में गंगा अपने उद्गम से शतकाधिक योजन दूर आ गई थी, या शायद गुरूर में अनसुना कर गई। अब क्या सोचती होगी गंगा? क्या यही नियति है? या वह मृत हो गई है और अब सोच नहीं सकती?

एक शाम जब मैं गंगासागर घूमने गया था, तो बरबस ही पूछ बैठा था, “तुम खुश तो हो ना गंगा?” शायद पूर्णिमा थी, गहरी चाँदनी में एक अट्टहास और भयानक गर्जना के रूप में जवाब आया था। मुझे फिर यकीन है कि वह आवाज गंगा की नहीं थी, वह समंदर था।

मैं भी अक्सर सोचता हूँ कि मुझमें कोई गंगा जैसी बात है या मैं उन दूसरों के जैसा हूँ जिनमें गंगा जैसी कोई बात नहीं। फिर सोचता हूँ कि एक दिन इस बारे में अच्छे से सोचूँगा और तय करूँगा कि मैं गंगा में मिल रहा हूँ या समंदर में। यह अलग बात है कि मैं अभी उच्छृंखल हूँ और आत्ममुग्ध बह रहा हूँ।