कल रात भर …………………‘बेपरवाह’

मैं रात भर जन्नत में था थी तलब जिनसे रूबरू कि, थी आरजू जिनसे गुप्तगू कि, वो चाँद कल मेरे आँगन में था | मैं रात भर जन्नत में था | मासूम चेहरा, अधरों पर मुस्कान लिए, झील सी आँखें, सुर्ख होंठ, घनेरी जुल्फ, यौवन में उफ़ान लिए , वो प्रतिरूप अप्सरा कि, नूर इस धरा की | वो...
‘बेपरवाह’

‘बेपरवाह’

ख़ामोश सड़क थी और झमाझम बारिश मैं भींगकर आज कपकपातीं हाड़ लेकर सड़क पर टहलता रहा | कुछ पेड़ पर मुस्कुराते, कुछ सड़क पर बिखड़े पलास और सेमल के फूल, मुझे याद आया वो तेरी अठखेलियाँ तेरा मुस्कुराना, मुझसे लिपट जाना एक हवा के झोकें में तेरा आहट पाया | तभी पैर फिसला, अभी पैर फिसला...
अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी

अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी

हार-जित से तो यूँ हीं बदनाम है जिन्दगी दरअसल, अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी | जब तक सांस है, तुझमे जद है, सवार लो जिन्दगी | न जाने कब शमशान हो जिन्दगी | हँस लो, मुस्कुरा लो….. ढूँढ लो हर ख़ुशी | क्या पता कब खाक हो जिन्दगी | क्या फ़कीरी, क्या अमीरी क्या इबादत, क्या...